महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे राज्य में मराठी भाषा और अस्मिता को लेकर अक्सर आक्रामक बयान और कार्रवाइयाँ करते रहे हैं। पार्टी का दावा है कि मराठी को सार्वजनिक और सरकारी जीवन में पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा है, जिससे महाराष्ट्र की संस्कृति अपमानित हो रही है। इस मुद्दे पर पार्टी ने कई बार उग्र प्रदर्शन किए, बैंकों और निजी संस्थानों में कर्मचारियों से जबरन मराठी में बात करने की माँग की, और यहाँ तक कि हिंसा का भी सहारा लिया।
हालांकि हालिया नागपुर हिंसा, जिसमें हिंदू समुदाय पर संगठित हमला हुआ, ने एमएनएस की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में जहां राज्य भर में रोष देखा गया, वहीं एमएनएस और राज ठाकरे की पूरी तरह चुप्पी ने जनमानस को चौंका दिया। एक ओर पार्टी मराठी भाषा के अपमान पर आक्रोश जताती है, वहीं जब हिंदू समुदाय पर सीधा हमला होता है, तब वह प्रतिक्रिया देने से बचती है।
इस दोहरे रवैये से पार्टी की विचारधारा और राजनीतिक एजेंडे को लेकर संदेह और आलोचना दोनों ही बढ़ी हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या एमएनएस का उद्देश्य वास्तव में सांस्कृतिक संरक्षण है या फिर केवल वोटबैंक की राजनीति को साधने का एक माध्यम? क्या हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर मौन रहकर पार्टी अप्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिक तुष्टीकरण में लिप्त है?
इतिहास गवाह है कि एमएनएस हिंसा, धमकी और डर फैलाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में माहिर रही है। पार्टी नेताओं पर संगीन आरोप हैं, जैसे कि ठाणे में एमएनएस अध्यक्ष अविनाश जाधव पर ₹5 करोड़ की रंगदारी और मारपीट का मामला, और नवी मुंबई में अपहरण व फिरौती की घटना में एमएनएस यूनियन सचिव की गिरफ्तारी। साथ ही, वर्ष 2008 में उत्तर भारतीयों पर हुए हमलों से लेकर हालिया बैंकों में कर्मचारियों की भाषा को लेकर उत्पीड़न तक, पार्टी ने लगातार विभाजनकारी राजनीति की है।
राज ठाकरे द्वारा बार-बार यह तर्क देना कि मराठी भाषा की अनदेखी राज्य के सम्मान के खिलाफ है, तब कमजोर पड़ जाता है जब पार्टी हिंदुओं पर हो रही हिंसा पर चुप्पी साध लेती है। नागपुर की घटना एक स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ कई संगठनों ने विरोध और कार्रवाई की माँग की, लेकिन एमएनएस का एक भी बयान सामने नहीं आया।
भाषा और संस्कृति का संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे हिंसा और पक्षपात के ज़रिये लागू करना न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि समाज को विघटन की ओर भी ले जाता है। एमएनएस की यह रणनीति महाराष्ट्र में सामाजिक समरसता और सौहार्द को नुकसान पहुँचा सकती है। यदि पार्टी वास्तव में राज्य की अस्मिता की रक्षा करना चाहती है, तो उसे हर प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ समान रूप से खड़ा होना पड़ेगा, चाहे वह मराठी भाषा से जुड़ी हो या हिंदू समाज के खिलाफ हो रही हिंसा से।