छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मराठी भाषी समुदाय को भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा देने के मुद्दे पर राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश बिलासपुर निवासी डॉ. सचिन अशोक काले द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में कहा गया था कि छत्तीसगढ़ में रहने वाले मराठी भाषी नागरिकों को उन अधिकारों और सुविधाओं से वंचित रहना पड़ रहा है, जो अन्य राज्यों में मराठी भाषियों को भाषाई अल्पसंख्यक के रूप में उपलब्ध हैं।
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि राज्य सरकार द्वारा अब तक इस विषय पर स्पष्ट निर्णय न लेने के कारण मराठी समुदाय के छात्रों और नागरिकों को शैक्षणिक व सांस्कृतिक लाभ से वंचित होना पड़ता है। अदालत के समक्ष पेश की गई जानकारी में यह उल्लेख था कि डॉ. काले ने 27 नवंबर 2024 को इस संबंध में राज्य शासन को ज्ञापन दिया था, जिसका अभी तक कोई निपटारा नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा देना पूरी तरह एक नीतिगत निर्णय है और अदालत इसे सीधे तौर पर आदेशित नहीं कर सकती। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों द्वारा प्रस्तुत मांगों पर समयबद्ध निर्णय ले। इसी क्रम में अदालत ने सरकार को तीन महीने की कठोर समयसीमा देते हुए याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन पर विचार कर औपचारिक निर्णय लेने का निर्देश दिया।
इस आदेश से छत्तीसगढ़ के मराठी भाषी समुदाय में नई उम्मीद जग गई है, क्योंकि लंबे समय से वे भाषाई अल्पसंख्यक के अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे थे। यदि राज्य सरकार इस दिशा में सकारात्मक निर्णय लेती है, तो मराठी भाषियों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण, भाषा संरक्षण कार्यक्रम, और सांस्कृतिक सहायता जैसी कई सुविधाएं उपलब्ध हो सकती हैं।
अब सबकी निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वह मराठी समुदाय की इस पुरानी मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या छत्तीसगढ़ में भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर बड़ा कदम उठाया जाएगा।



