छत्तीसगढ़ में धार्मिक धर्मांतरण को लेकर एक बार फिर हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। बस्तर संभाग के कांकेर जिले से शुरू हुआ एक स्थानीय विवाद देखते ही देखते राज्यव्यापी अशांति का कारण बन गया। मामला कांकेर जिले के एक गांव से जुड़ा है, जहां निर्वाचित सरपंच राजमन सलाम के पिता का अंतिम संस्कार ईसाई रीति-रिवाज से पारिवारिक जमीन पर किया गया। ग्रामीणों के एक वर्ग ने इस पर आपत्ति जताते हुए दावा किया कि संबंधित भूमि स्थानीय देवी-देवता से जुड़ी है और वहां इस प्रकार का दफन पारंपरिक मान्यताओं के खिलाफ है।
आपत्ति के बाद हालात बिगड़ गए और कथित तौर पर शव को बाहर निकालने की कोशिश की गई, जिसके चलते गांव में हिंसक झड़पें हुईं। स्थिति इतनी बिगड़ी कि आसपास के इलाकों में तनाव फैल गया। बड़ेटेओड़ा गांव में प्रार्थना स्थलों पर तोड़फोड़ की गई और पुलिस के हस्तक्षेप के दौरान 20 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद माहौल और अधिक भड़क गया। रायपुर समेत अन्य शहरों में भी क्रिसमस से जुड़े सजावटी सामानों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं।
इस घटनाक्रम के बाद हिंदू संगठनों के एक समूह ‘सर्व हिंदू समाज’ के बैनर तले 24 दिसंबर 2025 को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया गया। बंद का असर रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, बस्तर और अन्य संवेदनशील जिलों में आंशिक से लेकर व्यापक रूप में देखा गया। कई स्थानों पर दुकानें बंद रहीं और सार्वजनिक परिवहन प्रभावित हुआ, जबकि कुछ जिलों में स्थिति सामान्य बनी रही।
प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए गश्त बढ़ा दी गई। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की हिंसा या सांप्रदायिक उकसावे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में लंबे समय से चल रही धर्मांतरण बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। एक ओर ईसाई समुदाय के लोग धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मानजनक अंतिम संस्कार के अधिकार की बात कर रहे हैं, वहीं हिंदू संगठनों का आरोप है कि आदिवासी क्षेत्रों में लालच और दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। इससे पहले भी वर्ष 2022 में इसी तरह का एक मामला सामने आया था, जब एक ईसाई महिला को गांव में दफनाने की अनुमति नहीं दी गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आदिवासी परंपराओं, भूमि अधिकारों और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा है। लगातार बढ़ती ऐसी घटनाएं राज्य में ध्रुवीकरण को गहरा कर रही हैं और मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीति और तेज होने की संभावना है, ऐसे में प्रशासन के लिए शांति और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।



