तमिलनाडु में बच्चों के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में दर्ज 4,338 मामलों की तुलना में वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 6,968 तक पहुंच गई। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद राज्य में बच्चों की सुरक्षा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में तमिलनाडु में बच्चों के खिलाफ 6,064 मामले दर्ज किए गए थे। इसके बाद वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 6,580 हो गई और वर्ष 2023 में 6,968 मामले दर्ज किए गए। इस अवधि में दर्ज मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है।
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में राज्य में 67 बच्चों की हत्या के मामले दर्ज किए गए। वहीं पिछले तीन वर्षों की अवधि में कुल 217 बच्चों की हत्या के मामले सामने आए। कुछ मामलों में यौन उत्पीड़न के बाद हत्या की भी घटनाएं दर्ज की गईं।
कृष्णागिरी जिले में ढाई वर्ष की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना के बाद यह मुद्दा और प्रमुखता से सामने आया। पुलिस ने मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार किया था, जिसके स्थानीय स्तर पर एक राजनीतिक संगठन से जुड़े होने की बात सामने आई थी। इस घटना के बाद राज्य में बच्चों की सुरक्षा को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हुई।
कृष्णागिरी जिले में ही एक अन्य मामले में पुलिस ने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति ने एक निजी स्कूल में प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने का दावा करते हुए परिसर में प्रवेश किया और बाद में छात्राओं के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आए। इस घटना के बाद स्कूल परिसरों में सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए गए।
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों की बढ़ती संख्या और न्यायिक प्रक्रिया में देरी को भी चिंता का विषय बताया है। रिपोर्टों के अनुसार राज्य में पॉक्सो मामलों की बड़ी संख्या लंबित है और विशेष अदालतों की कमी को इसका एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
राज्य सरकार का कहना है कि अपराधों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है और सभी मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। वहीं विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए न्यायिक ढांचे को सुदृढ़ करने की मांग की है।


