उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दुर्लभ मालाबार पाइड हॉर्नबिल पक्षियों के संरक्षण के लिए वन विभाग द्वारा नई पहल शुरू की गई है। अधिकारियों के अनुसार इस पहल के तहत जंगल और आसपास के क्षेत्रों में फलदार वृक्षों के प्राकृतिक समूह विकसित किए जा रहे हैं, जिन्हें “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” के रूप में तैयार किया जाएगा। इसका उद्देश्य हॉर्नबिल पक्षियों को पूरे वर्ष प्राकृतिक भोजन उपलब्ध कराना और उनके सुरक्षित आवास को सुदृढ़ करना है।
वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के मार्गदर्शन में संचालित इस कार्यक्रम के अंतर्गत पीपल, बरगद तथा फाइकस प्रजाति के पौधों का रोपण किया जा रहा है। वन अधिकारियों ने बताया कि फाइकस प्रजाति के वृक्ष हॉर्नबिल का प्रमुख आहार स्रोत हैं, जिससे इन पक्षियों की नियमित उपस्थिति और प्रजनन गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। विभाग ने स्पष्ट किया कि “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” किसी प्रकार का कृत्रिम निर्माण नहीं होगा, बल्कि प्राकृतिक रूप से विकसित वृक्ष समूह होंगे।
वन विभाग के अनुसार हॉर्नबिल प्रजातियों के संरक्षण के लिए घोंसलों की निगरानी, कृत्रिम घोंसले लगाने तथा अनुसंधान गतिविधियों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए घोंसला गोद लेने जैसे कार्यक्रमों को भी शामिल किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि इस प्रकार के सामुदायिक प्रयास संरक्षण कार्यों को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार मालाबार पाइड हॉर्नबिल सामान्यतः पश्चिमी घाट क्षेत्र में पाए जाते हैं, लेकिन उदंती-सीतानदी के पहाड़ी क्षेत्रों में अनुकूल जलवायु और हरियाली के कारण इनकी उपस्थिति में वृद्धि दर्ज की गई है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक पहले जहां इन पक्षियों का दर्शन सीमित अवसरों पर होता था, वहीं अब सप्ताह में दो से तीन बार इनकी उपस्थिति देखी जा रही है।
हॉर्नबिल पक्षियों को वन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ये फल खाने के बाद बीजों का प्रसार करते हैं, जिससे वनों के प्राकृतिक पुनर्जनन और विस्तार में योगदान मिलता है। इसी कारण इन्हें जंगल का प्राकृतिक माली या फॉरेस्ट इंजीनियर भी कहा जाता है।
वन विभाग ने बताया कि हॉर्नबिल संरक्षण कार्यक्रम के तहत विशेष ट्रैकिंग टीमों का गठन किया गया है। इन टीमों में वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं को शामिल किया गया है, जो घोंसलों की सुरक्षा और नियमित निगरानी का कार्य कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त ड्रोन तकनीक के माध्यम से शिकार गतिविधियों तथा वनाग्नि की निगरानी भी की जा रही है।
वन अधिकारियों का कहना है कि यह पहल जैव विविधता संरक्षण के साथ-साथ ईको-टूरिज्म को भी प्रोत्साहित करेगी। इससे पर्यटक प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित दूरी से दुर्लभ पक्षियों का अवलोकन कर सकेंगे और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।



