देहरादून में नस्लीय नफरत की एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। त्रिपुरा के रहने वाले 24 वर्षीय अंजेल चकमा, जो देहरादून की जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में एमबीए के अंतिम वर्ष के छात्र थे, ने 26 दिसंबर 2025 को अस्पताल में दम तोड़ दिया। अंजेल पर 9 दिसंबर की शाम देहरादून के सेलाकुई मार्केट इलाके में नस्लीय गालियां देने के बाद चाकू से जानलेवा हमला किया गया था।
परिजनों और पुलिस के अनुसार अंजेल अपने छोटे भाई माइकल चकमा के साथ रोजमर्रा का सामान खरीदने बाजार गए थे। इसी दौरान नशे में धुत कुछ स्थानीय युवकों ने उन्हें “चाइनीज”, “चिंकी” और “मोमो” जैसे नस्लीय अपशब्द कहे। जब अंजेल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि “हम भारतीय हैं”, तो विवाद बढ़ गया और देखते ही देखते हमला कर दिया गया। आरोपियों ने चाकू और कड़े जैसे हथियारों से अंजेल के गर्दन, रीढ़ और पेट पर गंभीर वार किए।
गंभीर रूप से घायल अंजेल को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वे दो सप्ताह से अधिक समय तक वेंटिलेटर पर जीवन और मृत्यु से संघर्ष करते रहे। आखिरकार 26 दिसंबर को उनकी मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने मामले में हत्या की धाराएं जोड़ते हुए कार्रवाई तेज कर दी है। अब तक अविनाश नेगी, सूरज खवास, सुमित सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक एक मुख्य आरोपी के नेपाल की ओर फरार होने की आशंका है, जिसकी तलाश जारी है।
अंजेल चकमा का पार्थिव शरीर 27–28 दिसंबर को त्रिपुरा लाया गया, जहां अंतिम संस्कार के दौरान भारी जनाक्रोश देखने को मिला। त्रिपुरा समेत पूर्वोत्तर के कई राज्यों में कैंडल मार्च और विरोध प्रदर्शन हुए। चकमा डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट में सुनवाई और नस्लीय हिंसा के खिलाफ अलग कानून बनाने की मांग की है।
यह मामला केवल एक छात्र की हत्या नहीं, बल्कि भारत में पूर्वोत्तर समुदाय के लोगों के खिलाफ जारी नस्लीय भेदभाव की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। अंजेल चकमा के आखिरी शब्द — “मैं भारतीय हूं” — आज नस्लीय नफरत के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुके हैं और यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या देश के हर नागरिक को समान सम्मान और सुरक्षा मिल पा रही है या नहीं।



