तमिलनाडु के तिरुत्तणी कस्बे में 27 दिसंबर की रात ओडिशा से आए 20 वर्षीय प्रवासी मजदूर के. सूरज के साथ हुई बर्बर हिंसा ने देशभर में आक्रोश पैदा कर दिया है। यह घटना तब सामने आई जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें सूरज को खून से लथपथ हालत में देखा गया। वीडियो में हमलावर न सिर्फ दरांती से हमला करते दिखे, बल्कि अपराध के बाद जीत का इशारा करते हुए कैमरे के सामने पोज़ भी देते नजर आए।
जानकारी के अनुसार, सूरज पर हमला करने वाले चारों आरोपी नशे की हालत में थे और इंस्टाग्राम रील बनाने की मंशा से इलाके में घूम रहे थे। किसी बात को लेकर सूरज से बहस होने के बाद उसे जबरन एक सुनसान रेलवे क्वार्टर में ले जाया गया, जहां लाठी-डंडों और दरांतियों से उस पर जानलेवा हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल सूरज को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी हालत नाजुक बताई गई।
घटना के सामने आने के बाद तमिलनाडु पुलिस और DMK सरकार ने तुरंत यह दावा किया कि इस हमले में किसी तरह का नस्ली या पहचान आधारित एंगल नहीं है। पुलिस ने चार किशोरों की गिरफ्तारी की बात कही, जिनमें से तीन को ‘प्लेस ऑफ सेफ्टी’ भेज दिया गया, जबकि एक आरोपी को उसके माता-पिता के सुपुर्द किया गया। हालांकि, इस कार्रवाई के बावजूद पीड़ित सूरज की वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
सोशल मीडिया पर यह चिंता तेज़ी से फैलने लगी कि सूरज आखिर कहां है और उसकी हालत क्या है। कई यूज़र्स और संगठनों ने आशंका जताई कि या तो उसे गुपचुप तरीके से गायब कर दिया गया है या फिर मामले को शांत करने के लिए सच्चाई छुपाई जा रही है। इसी बीच ‘लीगल राइट्स ऑब्ज़र्वेटरी’ नामक एडवोकेसी ग्रुप ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि क्या सूरज जीवित है या नहीं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से हस्तक्षेप की मांग की।
DMK प्रवक्ताओं और सरकार समर्थक सोशल मीडिया तंत्र ने इन सवालों को “फेक न्यूज़” करार देते हुए खारिज करने की कोशिश की। पार्टी प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने ट्वीट कर कहा कि सूरज अस्पताल से स्वेच्छा से छुट्टी लेकर ओडिशा लौट गया है। वहीं, उत्तरी ज़ोन के पुलिस महानिरीक्षक असरा गर्ग ने भी यही दावा दोहराया कि सूरज ने खुद घर लौटने की इच्छा जताई थी।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि क्या सूरज वास्तव में ओडिशा पहुंच चुका है। उसकी यात्रा, स्वास्थ्य स्थिति या परिवार से संपर्क को लेकर अब तक कोई ठोस सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है। जिस हालत में सूरज को आखिरी बार देखा गया, उसे देखते हुए यह दावा संदेह के घेरे में है।
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि तमिलनाडु में प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन चुका है। सूरज की चुप्पी और प्रशासन की अस्पष्टता ने आशंकाओं को और गहरा कर दिया है। जब तक पीड़ित की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक यह मामला राज्य सरकार के लिए एक खुला घाव बना रहेगा।



