तमिलनाडु में सामने आ रहा किडनी रैकेट केवल एक आपराधिक गिरोह की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और सामाजिक असमानता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। वर्षों से राज्य के कई जिलों में गरीब, बेरोज़गार और प्रवासी मज़दूरों को आर्थिक मदद, नौकरी या इलाज का झांसा देकर उनकी किडनी निकलवाई जा रही है, जबकि इस पूरे खेल में दलाल, निजी अस्पताल, फर्जी दस्तावेज़ बनाने वाले और कथित तौर पर कुछ मेडिकल पेशेवर भी शामिल पाए गए हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह रैकेट मुख्य रूप से चेन्नई, वेल्लोर, मदुरै, तिरुनेलवेली और कोयंबटूर जैसे जिलों में सक्रिय रहा है। गरीब तबके के लोगों को पहले विश्वास में लिया जाता है, फिर उन्हें यह बताया जाता है कि किडनी दान “कानूनी” है और इससे उन्हें कोई दीर्घकालिक नुकसान नहीं होगा। कई मामलों में पीड़ितों से कहा गया कि वे किसी दूर के रिश्तेदार को किडनी दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता में फर्जी रिश्तेदारी के दस्तावेज़ बनाकर अमीर मरीजों का ट्रांसप्लांट किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार, एक किडनी के बदले दाता को 3 से 5 लाख रुपये तक दिए जाते हैं, जबकि उसी किडनी के लिए मरीज से 25 से 40 लाख रुपये तक वसूले जाते हैं। यह भारी अंतर दलालों और नेटवर्क के अन्य हिस्सेदारों की जेब में जाता है। कई पीड़ितों ने आरोप लगाया है कि ऑपरेशन के बाद उन्हें पूरी रकम भी नहीं दी गई और स्वास्थ्य बिगड़ने पर कोई जिम्मेदारी नहीं ली गई।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई मामलों में अंग प्रत्यारोपण से जुड़े अनिवार्य नियमों का खुला उल्लंघन हुआ। ट्रांसप्लांट अथॉरिटी की अनुमति, पारिवारिक संबंधों की पुष्टि और मेडिकल एथिक्स — सब कुछ कागज़ों तक सीमित रह गया। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ निजी अस्पतालों ने आंख मूंदकर संदिग्ध मामलों में सर्जरी की, जबकि उन्हें यह स्पष्ट दिख रहा था कि दाता और प्राप्तकर्ता के बीच कोई वास्तविक संबंध नहीं है।
तमिलनाडु पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा समय-समय पर रैकेट का भंडाफोड़ किया गया, कुछ दलाल गिरफ्तार भी हुए, लेकिन हर कार्रवाई के बाद यह नेटवर्क नए नामों और नए तरीकों से फिर सक्रिय हो गया। यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या केवल निचले स्तर के दलालों की गिरफ्तारी से इस संगठित अपराध को रोका जा सकता है, या फिर अस्पताल प्रबंधन और सिस्टम के भीतर मौजूद संरक्षण की भी निष्पक्ष जांच होगी।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह रैकेट गरीबी और असमानता का सबसे क्रूर परिणाम है, जहां ज़रूरतमंद अपने शरीर का हिस्सा बेचने को मजबूर हैं और व्यवस्था उन्हें बचाने में असफल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंग दान और प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, सख़्त निगरानी और दोषियों पर कड़ी सज़ा सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक तमिलनाडु ही नहीं, पूरे देश में किडनी तस्करी जैसे अपराध जड़ जमाए रहेंगे।
तमिलनाडु किडनी रैकेट एक चेतावनी है — कि स्वास्थ्य सेवा जब मुनाफ़े और भ्रष्टाचार के हाथों गिरवी रख दी जाती है, तो सबसे पहले गरीब और कमजोर ही कुचले जाते हैं।



