तमिलनाडु में बाल यौन अपराधों से संबंधित POCSO मामलों में 2024–25 के दौरान अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राज्य में POCSO केस रजिस्ट्रेशन में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, जो न केवल अपराध की गंभीरता को दर्शाती है बल्कि न्याय प्रणाली पर बढ़ते दबाव की भी ओर इशारा करती है।
विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह बढ़ोतरी केवल अपराध में इज़ाफा नहीं, बल्कि रिपोर्टिंग में आई जागरूकता का भी परिणाम है। स्कूलों, अस्पतालों और पुलिस के लिए अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था, मीडिया कवरेज और सामाजिक जागरूकता अभियानों के कारण वे मामले भी सामने आ रहे हैं जो पहले परिवारों के भीतर दबे रह जाते थे।
पिछले 6 महीनों में POCSO दोषसिद्धि का जिला-वार ट्रेंड
पिछले छह महीनों (जुलाई–दिसंबर 2025) के दौरान विशेष POCSO अदालतों में कई महत्वपूर्ण फैसले आए हैं। उपलब्ध जिला-स्तरीय न्यायिक रिकॉर्ड और अभियोजन रिपोर्टों के आधार पर निम्न रुझान सामने आए हैं:
- तिरुनेलवेली: 29 दोषसिद्धि
- चेन्नई (ग्रेटर सिटी): 34 मामलों में सजा
- कोयंबटूर: 21 दोषसिद्धि
- मदुरै: 18 दोषसिद्धि
- सेलम: 15 दोषसिद्धि
- विल्लुपुरम: 14 दोषसिद्धि
- तिरुचिरापल्ली: 12 दोषसिद्धि
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि दोषसिद्धि हो रही है, लेकिन केस दर्ज होने की रफ्तार के मुकाबले यह संख्या अभी भी कम है। न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और लंबित मामलों की संख्या एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सबसे चिंताजनक तथ्य: रिश्तेदार ही आरोपी
तमिलनाडु में दर्ज POCSO मामलों में सबसे गंभीर पहलू यह है कि 60 प्रतिशत से अधिक मामलों में आरोपी पीड़ित का परिचित या करीबी रिश्तेदार पाया गया है। इनमें पिता, सौतेले पिता, चाचा, मामा, पड़ोसी और पारिवारिक मित्र शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यही कारण है कि कई मामलों में शिकायत दर्ज होने में देरी होती है। सामाजिक दबाव, बदनामी का डर और आर्थिक निर्भरता बच्चों और उनके परिवारों को चुप रहने पर मजबूर करती है।
न्याय व्यवस्था पर दबाव
राज्य में फिलहाल 19 विशेष POCSO अदालतें संचालित हैं, जबकि मामलों की संख्या के अनुपात में यह संख्या अपर्याप्त मानी जा रही है। लंबित मामलों की वजह से कई पीड़ित परिवार वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते हैं, जिससे अपराधियों के मन में डर कम होता है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि त्वरित सुनवाई, गवाह संरक्षण और मनोवैज्ञानिक सहायता को मजबूती नहीं दी गई, तो दोषसिद्धि दर में सुधार के बावजूद अपराध पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा।



