बस्तर डिमाइनिंग अभियान अब नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की प्राथमिक कार्रवाई बन गया है। केंद्र सरकार की ओर से ‘नक्सल मुक्त भारत’ की घोषणा के बाद बस्तर संभाग और आसपास के संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों ने बड़े स्तर पर डिमाइनिंग ऑपरेशन तेज कर दिया है। इस अभियान का मकसद उन सड़कों और अंदरूनी रास्तों को पूरी तरह सुरक्षित बनाना है, जहां वर्षों तक नक्सली गतिविधियों के कारण IED और विस्फोटकों का खतरा बना रहा।
सुरक्षा बलों के मुताबिक बस्तर डिमाइनिंग अभियान के तहत सीआरपीएफ, छत्तीसगढ़ पुलिस के डीआरजी और अन्य सुरक्षा एजेंसियां मिलकर राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य मार्गों और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों की सड़कों पर सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। इन इलाकों को पहले नक्सल प्रभाव वाले हाई रिस्क जोन माना जाता था।
ऑपरेशन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि डिमाइनिंग की कार्रवाई सिर्फ सड़क खोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामान्य जनजीवन बहाल करने की दिशा में भी बड़ा कदम माना जा रहा है। जिन रास्तों पर पहले लोग सुरक्षा के डर से जाने से बचते थे, उन्हें अब पूरी तरह सुरक्षित बनाने की कोशिश की जा रही है।
बस्तर डिमाइनिंग अभियान में खुफिया इनपुट्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व नक्सलियों से मिली जानकारी भी इस ऑपरेशन में मददगार साबित हो रही है। ऐसे कई संवेदनशील स्थानों की पहचान की जा रही है, जहां पहले विस्फोटक लगाए जाने की आशंका थी।
सीआरपीएफ के अधिकारियों के मुताबिक डिमाइनिंग ऑपरेशन को मिशन मोड में चलाया जा रहा है। सुरक्षा बल सड़क किनारे, जंगलों के रास्तों और अंदरूनी संपर्क मार्गों की बारीकी से जांच कर रहे हैं ताकि किसी भी तरह का छिपा हुआ खतरा समय रहते निष्क्रिय किया जा सके।
बस्तर डिमाइनिंग अभियान में आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। सुरक्षा बलों ने K9 डॉग स्क्वॉड, कॉम्पैक्ट डिटेक्शन डिवाइस, वायर डिटेक्टर और अन्य उपकरणों को ऑपरेशन में शामिल किया है। कठिन और घने जंगल वाले इलाकों में मैकेनिकल उपकरणों और ट्रैक्टर आधारित तकनीक का भी उपयोग किया जा रहा है।
ऑपरेशन से पहले कई इलाकों में ड्रोन की मदद से हवाई निगरानी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि ड्रोन से आगे के इलाके स्कैन किए जाते हैं, जिससे संदिग्ध गतिविधियों या संभावित खतरे की पहले ही पहचान हो जाती है। इसके बाद ग्राउंड टीम कार्रवाई करती है।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि बस्तर डिमाइनिंग अभियान आसान नहीं है, क्योंकि जमीन के नीचे छिपे विस्फोटकों को खोजने और निष्क्रिय करने में हमेशा जोखिम बना रहता है। इसके बावजूद अभियान को पूरी सावधानी के साथ चलाया जा रहा है।
अधिकारियों के मुताबिक, यह ऑपरेशन सिर्फ किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। बस्तर क्षेत्र के कई हिस्सों में अलग-अलग बटालियन समन्वय के साथ यह अभियान चला रही हैं। खास फोकस उन रास्तों पर है, जो दूरस्थ गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ते हैं।
स्थानीय स्तर पर इसे विकास और सामान्य जीवन बहाली से भी जोड़कर देखा जा रहा है। जिन गांवों में सड़क सुरक्षा की वजह से आवाजाही प्रभावित होती थी, वहां अब लोगों के बीच भरोसा बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
बस्तर डिमाइनिंग अभियान को सुरक्षा एजेंसियां पोस्ट-कॉन्फ्लिक्ट यानी संघर्ष के बाद सबसे महत्वपूर्ण अभियानों में से एक मान रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ नक्सल गतिविधियों पर नियंत्रण ही काफी नहीं है, बल्कि उन छिपे हुए खतरों को खत्म करना भी जरूरी है, जो आम नागरिकों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
सुरक्षा बलों का दावा है कि आने वाले समय में और ज्यादा रास्तों को पूरी तरह IED मुक्त बनाया जाएगा, ताकि ग्रामीण इलाकों में आवाजाही, विकास कार्य और सामान्य जनजीवन बिना डर के आगे बढ़ सके।



