शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) में सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने देशभर में स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यशैली और डॉक्टरों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिसंबर 2025 में सामने आए इस मामले में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. राघव नारुला का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें वह फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित मरीज अर्जुन सिंह के साथ मारपीट करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में दोनों के बीच तीखी बहस के बाद डॉक्टर को मरीज पर हाथ उठाते देखा गया, जिसने आम लोगों को झकझोर कर रख दिया।
घटना सामने आते ही हिमाचल प्रदेश सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए डॉ. राघव नारुला की सेवाएं समाप्त कर दीं और उन्हें जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया गया। मरीज की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और विभागीय जांच समिति का गठन किया गया। जांच में यह निष्कर्ष निकला कि विवाद के लिए दोनों पक्ष आंशिक रूप से जिम्मेदार थे, लेकिन एक डॉक्टर द्वारा मरीज के साथ शारीरिक हिंसा को “लोक सेवक के आचरण के सर्वथा विपरीत” माना गया।
यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बढ़ती प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है, जहां कुछ डॉक्टर मरीजों के प्रति असंवेदनशील और आक्रामक व्यवहार अपनाते नजर आ रहे हैं। बीते कुछ समय में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां मरीजों ने डॉक्टरों पर गाली-गलौज, थप्पड़ मारने या इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में अत्यधिक दबाव, संसाधनों की कमी और लंबे कार्य घंटे डॉक्टरों को मानसिक तनाव में डालते हैं, लेकिन इसके बावजूद मरीज पर हिंसा को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। आलोचकों का कहना है कि समस्या की जड़ कुछ डॉक्टरों में पनपता तथाकथित “गॉड कॉम्प्लेक्स” है, जिसमें वे खुद को सवालों से ऊपर समझने लगते हैं और मरीजों को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं।
इस घटना के बाद IGMC शिमला के बाहर स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया और मरीजों की सुरक्षा के लिए सख्त नियम लागू करने की मांग की। सोशल मीडिया पर भी #PatientSafety और #DoctorMisconduct जैसे हैशटैग के साथ लोगों ने गुस्सा जाहिर किया। कई लोगों ने यह सवाल उठाया कि जब डॉक्टर खुद हिंसा पर उतर आएंगे, तो आम नागरिक इलाज के लिए किस पर भरोसा करेगा।
शिमला का यह मामला एक चेतावनी है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में केवल डॉक्टरों की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मरीजों की गरिमा और सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मेडिकल पेशे की नींव विश्वास, करुणा और नैतिकता पर टिकी होती है। यदि इस भरोसे में दरार पड़ी, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। ऐसे में जरूरी है कि मेडिकल संस्थानों में जवाबदेही, पारदर्शिता और नैतिक प्रशिक्षण को और मजबूत किया जाए, ताकि इलाज का रिश्ता डर नहीं, भरोसे पर कायम रह सके।



