दुर्ग जिले में कानून व्यवस्था को लेकर एक अजीबोगरीब स्थिति सामने आई है, जहां दुर्ग पुलिस ने मड़ई मेला, बाजार और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में अभियान चलाकर लगभग 150 लोहे के कड़े जब्त करने को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया है। थाना नंदिनी पुलिस द्वारा जारी प्रेस नोट में दावा किया गया कि कुछ युवक बड़े लोहे के कड़े पहनकर आम नागरिकों में भय का माहौल बना रहे थे, इसलिए मौके पर ही कड़े उतरवाकर जब्त किए गए।
हालांकि इस कार्रवाई को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर लोहे का कड़ा पहनना कब से अपराध की श्रेणी में आ गया? प्रेस नोट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह कार्रवाई किस कानून की किस धारा के तहत की गई। न ही यह बताया गया कि कड़े पहनने वाले लोगों के खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज की गई या उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि दुर्ग जिले में नशा तस्करी, अवैध सट्टा, चोरी, साइबर ठगी और संगठित अपराध जैसे गंभीर मामलों में पुलिस की कार्रवाई अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है, जबकि ऐसे मामलों में जहां कोई स्पष्ट अपराध नहीं दिखता, वहां “सख्त अभियान” चलाकर आंकड़े गिनाए जा रहे हैं।
कई लोगों का आरोप है कि जब पुलिस बड़े अपराधियों तक पहुंचने में असफल रहती है, तब वह आसान और सुरक्षित लक्ष्यों पर कार्रवाई कर अपनी सक्रियता साबित करने की कोशिश करती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या कड़े जब्त करने से वास्तव में अपराध पर अंकुश लगेगा, या यह केवल एक प्रतीकात्मक कार्रवाई है।
इस पूरे मामले में धार्मिक और सामाजिक संवेदनशीलता का पहलू भी जुड़ा हुआ है। लोहे का कड़ा कई हिंदू समुदायों में आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है। ऐसे में बिना किसी ठोस कानूनी आधार के कड़े उतरवाना और जब्त करना पुलिस की मंशा पर संदेह पैदा करता है।
पुलिस का दावा है कि इस कार्रवाई से आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना बढ़ी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लोगों के मन में भरोसे से ज्यादा सवाल खड़े हुए हैं। जनता यह जानना चाहती है कि क्या दुर्ग पुलिस वास्तविक अपराध से लड़ रही है या अपराध की परिभाषा बदलकर अपनी उपलब्धियां गिना रही है।
जब तक गंभीर और संगठित अपराधों पर पारदर्शी, कानूनी और निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तब तक इस तरह की कार्रवाइयाँ जनता का विश्वास मजबूत करने के बजाय और कमजोर ही करेंगी।



