भारत में सोशल कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर रिटर्न और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को लेकर विक्रेताओं की समस्याएं सामने आ रही हैं। विक्रेताओं का आरोप है कि रिटर्न प्रक्रिया अब केवल ग्राहक सेवा तक सीमित न रहकर अतिरिक्त शुल्क और अपारदर्शी कटौतियों के माध्यम से उनके लिए आर्थिक बोझ का कारण बन रही है।
विक्रेताओं के अनुसार, ऑर्डर पर दिखाई देने वाले सामान्य लॉजिस्टिक्स शुल्क के अलावा “अन्य शुल्क” जैसे अस्पष्ट मदें नियमित रूप से जोड़ी जा रही हैं। इन शुल्कों का स्पष्ट विवरण या सेवा से सीधा संबंध नहीं बताया जाता। कई विक्रेताओं का कहना है कि ये कटौतियां उस स्थिति में भी लागू होती हैं, जब ऑर्डर वापस नहीं किया जाता।

रिटर्न प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विक्रेताओं का कहना है कि कई मामलों में ग्राहकों द्वारा की गई शिकायतों को बिना फोटो, वीडियो या उत्पाद सत्यापन के स्वीकार कर लिया जाता है। रिटर्न स्वीकृत होने से पहले विक्रेताओं से न तो राय ली जाती है और न ही आपत्ति दर्ज करने का प्रभावी अवसर दिया जाता है।

एक बार रिटर्न स्वीकृत होने के बाद, विक्रेता को न केवल रिटर्न पिकअप शुल्क, बल्कि पहले से हुए फॉरवर्ड लॉजिस्टिक्स खर्च और संभावित उत्पाद क्षति का भी सामना करना पड़ता है। विक्रेताओं का दावा है कि लगभग एक किलोग्राम के रिटर्न पिकअप पर उनसे औसतन 170 रुपये से अधिक की राशि वसूली जाती है, जबकि वास्तविक लॉजिस्टिक्स लागत इससे कम होने की बात कही जा रही है।
विक्रेताओं का कहना है कि इस व्यवस्था का सीधा असर छोटे और मध्यम स्तर के व्यापारियों पर पड़ रहा है, जिनके मार्जिन पहले से ही सीमित होते हैं। एक अवैध या असत्यापित रिटर्न से कई सफल ऑर्डरों का मुनाफा समाप्त हो जाता है। इसके चलते कई विक्रेताओं को कीमतें बढ़ाने, कुछ श्रेणियों में बिक्री बंद करने या प्लेटफॉर्म छोड़ने जैसे निर्णय लेने पड़ रहे हैं।
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि इस लागत का असर अंततः उपभोक्ताओं तक भी पहुंचता है। बढ़ी हुई कीमतें, कम छूट और सीमित उत्पाद विकल्प इसकी परिणति हो सकते हैं। हालांकि उपभोक्ता को प्रत्यक्ष रूप से लॉजिस्टिक्स शुल्क नहीं दिखता, लेकिन वह उत्पाद मूल्य में शामिल रहता है।
वर्तमान में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए वास्तविक लॉजिस्टिक्स भुगतान, अतिरिक्त शुल्कों का विवरण या रिटर्न सत्यापन मानकों को सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं है। इस कारण प्लेटफॉर्म, विक्रेता और लॉजिस्टिक्स भागीदारों के बीच जोखिम और जिम्मेदारी के संतुलन पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विक्रेताओं का कहना है कि पारदर्शिता और जवाबदेही के अभाव में रिटर्न और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था का आर्थिक भार नीचे के स्तर पर स्थानांतरित हो रहा है। इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और नियामक ढांचे की आवश्यकता को लेकर मांगें तेज हो रही हैं।



