नाबालिग को सुप्रीम कोर्ट से बेल देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि जमानत खारिज करते समय जरूरी कानूनी मानकों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने साफ कहा कि न तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और न ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत जरूरी “ऑब्जेक्टिव असेसमेंट” किया, जबकि कानून इसकी स्पष्ट मांग करता है।
यह मामला एक नाबालिग आरोपी से जुड़ा है, जिस पर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के तहत केस दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस के वी विश्वनाथन और विजय बिश्नोई की बेंच इस मामले में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका में 12 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें नाबालिग को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत खारिज करने के लिए जो वजहें दी गईं, वे संतोषजनक नहीं हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 की धारा 12 के तहत जिन मानकों को परखा जाना जरूरी था, उनका वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता “कानून से संघर्षरत नाबालिग (juvenile in conflict with law)” है। अदालत ने यह भी नोट किया कि नाबालिग की मां एक सह-आरोपी के घर में घरेलू कामगार के रूप में काम करती है और फिलहाल नाबालिग एक ऑब्जर्वेशन होम में रखा गया था।
नाबालिग को सुप्रीम कोर्ट से बेल देते हुए बेंच ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत किसी बच्चे को जमानत देने से इनकार सिर्फ कुछ खास परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
धारा 12 के मुताबिक अगर बच्चे को जमानत देने से उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरा हो सकता है, या फिर न्याय के हित प्रभावित हो सकते हैं, तभी बेल रोकी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में न तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और न ही हाईकोर्ट ने इन मानकों पर कोई ठोस और निष्पक्ष विश्लेषण किया।
यही वजह रही कि कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के फैसले पर सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने NDPS एक्ट की धारा 37 पर भी विचार किया, जिसे आम तौर पर ड्रग्स मामलों में जमानत के लिए सख्त प्रावधान माना जाता है।
इस धारा के तहत अदालत को जमानत देने से पहले अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कसौटी पर भी देखने पर नाबालिग को राहत देने का prima facie आधार बनता है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि क्या है। अदालत ने माना कि नाबालिग की मां एक सह-आरोपी के घर में घरेलू काम करती है और यह तथ्य भी मामले में महत्वपूर्ण है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता विकल्प शर्मा ने दलील दी कि नाबालिग को बिना जरूरी कानूनी परीक्षण के जमानत से वंचित कर दिया गया।
उन्होंने अदालत को बताया कि नाबालिग का कोई स्वतंत्र आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह सिर्फ एक घरेलू कामगार की संतान है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए कहा कि नाबालिग को सुप्रीम कोर्ट से बेल देने का मामला बनता है।
अदालत ने आदेश दिया कि नाबालिग को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की संतुष्टि के अनुसार जमानत पर रिहा किया जाए।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका और इससे जुड़ी सभी लंबित अर्जियों का निपटारा कर दिया।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ किया है कि जुवेनाइल मामलों में सिर्फ आरोप की गंभीरता नहीं, बल्कि कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का पालन भी उतना ही जरूरी है।
यह आदेश उन मामलों में भी संदर्भ के तौर पर देखा जा सकता है, जहां नाबालिग आरोपियों की जमानत पर फैसला करते समय अदालतें जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 12 के तहत जरूरी कानूनी परीक्षण को नजरअंदाज कर देती हैं।



