मई 2026 में भारतीय शेयर बाजार पर एक बार फिर विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। बाजार आंकड़ों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FIIs ने इस महीने भारतीय इक्विटी बाजार से करीब 27 हजार करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। इसके साथ ही वर्ष 2026 में कुल विदेशी निकासी का आंकड़ा 2.2 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है।
लगातार बिकवाली के कारण दलाल स्ट्रीट पर दबाव बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में तेज रिटर्न देने वाले कई शेयरों में गिरावट देखने को मिली है। खासकर आईटी, बैंकिंग और मिडकैप सेक्टर में अधिक दबाव नजर आया। कई छोटे निवेशकों के लिए बाजार की यह गिरावट अचानक आई तेज कमजोरी जैसी रही।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की यह बिकवाली केवल भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी चिंता नहीं है। इसके पीछे वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ता रुझान जैसे कई कारण शामिल हैं।
हाल के सप्ताहों में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर सीधे महंगाई, रुपये और आर्थिक संतुलन पर पड़ता है। निवेशकों को डर है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो इसका असर कंपनियों की लागत और उपभोक्ता खर्च दोनों पर पड़ सकता है।
इसी बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। बाजार विश्लेषकों के मुताबिक जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशी निवेशकों को मुद्रा विनिमय से जुड़ा अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में वे जोखिम कम करने के लिए भारतीय बाजार से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं।
हालांकि इस पूरे दौर में घरेलू निवेशकों ने बाजार को पूरी तरह टूटने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों और SIP निवेश के जरिए लगातार घरेलू पैसा बाजार में आता रहा है। इसी वजह से कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय शेयर बाजार अब पहले की तुलना में अधिक घरेलू निवेश आधारित बनता जा रहा है।
बाजार जानकारों का कहना है कि कुछ साल पहले तक बाजार की दिशा काफी हद तक FIIs तय करते थे, लेकिन अब घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DIIs भी बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। यही कारण है कि विदेशी बिकवाली के बावजूद बाजार में पूरी तरह घबराहट जैसी स्थिति नहीं बनी।
लंबी अवधि के निवेशक अभी भी भारत की विकास संभावनाओं को लेकर सकारात्मक बने हुए हैं। डिजिटल इकोनॉमी, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में विस्तार, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और बड़ी युवा आबादी जैसे कारणों से भारत को मजबूत उभरती अर्थव्यवस्था माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा गिरावट के दौरान निवेशकों को जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना चाहिए। बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच मजबूत बुनियादी कंपनियों पर ध्यान रखना ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर FIIs की गतिविधियों, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों, कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर बनी रहेगी। फिलहाल बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना जताई जा रही है।



