बेंगलुरु की लॉजिस्टिक्स कंपनी Shadowfax पिछले कुछ वर्षों में भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ते डिलीवरी नेटवर्क्स में शामिल हो चुकी है। ईकॉमर्स, क्विक कॉमर्स और हाइपरलोकल डिलीवरी सेक्टर में तेजी से बढ़ती मांग का कंपनी को बड़ा फायदा मिला है। उद्योग से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक FY22 में जहां कंपनी की थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स (3PL) बाजार हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत मानी जा रही थी, वहीं FY26 तक यह बढ़कर लगभग 29 प्रतिशत तक पहुंच गई।
FY26 की चौथी तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू करीब ₹1,237 करोड़ बताया गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 73 प्रतिशत अधिक है। इसी दौरान कंपनी ने ₹55 करोड़ से ज्यादा का मुनाफा भी दर्ज किया, जबकि एक साल पहले कंपनी घाटे में थी। इन आंकड़ों ने Shadowfax को देश के तेजी से उभरते लॉजिस्टिक्स खिलाड़ियों में शामिल कर दिया है।
कंपनी में Flipkart, TPG NewQuest, Eight Roads Ventures, Mirae Asset, Qualcomm Ventures, IFC और Nokia Growth Partners जैसे बड़े निवेशकों की हिस्सेदारी बताई जाती है। इनमें Flipkart को कंपनी के सबसे बड़े शेयरधारकों में माना जाता है।
Shadowfax फिलहाल Flipkart, Myntra, AJIO, Nykaa, Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart, BigBasket और Meesho जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स के लिए लॉजिस्टिक्स सेवाएं संभाल रही है। लेकिन उद्योग जगत में लंबे समय से यह चर्चा है कि Meesho कंपनी के सबसे बड़े वॉल्यूम जनरेट करने वाले क्लाइंट्स में शामिल है, खासकर फैशन और रिवर्स लॉजिस्टिक्स से जुड़े ऑर्डर्स में।
यहीं से कंपनी के बिजनेस मॉडल को लेकर बड़ा सवाल शुरू होता है।
Meesho का बिजनेस मॉडल काफी हद तक कम कीमत वाले प्रोडक्ट्स, भारी डिस्काउंट, इम्पल्स खरीदारी और आसान रिटर्न पॉलिसी पर आधारित माना जाता है। ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर कम कीमत वाले फैशन और अनब्रांडेड सामान में रिटर्न रेट सामान्य ईकॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की तुलना में काफी ज्यादा देखा जाता है। इसका सीधा असर रिवर्स लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है, यानी ग्राहकों से सामान वापस उठाकर विक्रेताओं या वेयरहाउस तक पहुंचाने की प्रक्रिया पर।
लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए यह वॉल्यूम तो बढ़ाता है, लेकिन इसके साथ ऑपरेशनल जटिलताएं भी बढ़ जाती हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, Reddit, सेलर फोरम और शिकायत पोर्टल्स पर Shadowfax से जुड़ी कई शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। इनमें फर्जी पिकअप प्रयास, “customer unavailable” दिखाकर रिटर्न कैंसिल करना, देरी से पिकअप, गायब पार्सल और बार-बार फेल पिकअप जैसी शिकायतें शामिल हैं। इन शिकायतों का बड़ा हिस्सा Meesho ऑर्डर्स से जुड़ा बताया जाता है।
Meesho पर सामान बेचने वाले कई छोटे विक्रेताओं ने भी पिछले कुछ समय में रिवर्स लॉजिस्टिक्स चार्जेस को लेकर सवाल उठाए हैं। कई सेलर्स का आरोप है कि उन्हें स्पष्ट रूप से यह जानकारी नहीं मिलती कि रिटर्न पिकअप के नाम पर कितना शुल्क लिया जा रहा है, उसमें लॉजिस्टिक्स कंपनी का हिस्सा कितना है और नुकसान की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।
कुछ विक्रेताओं का कहना है कि उन्हें डैमेज रिटर्न, फर्जी रिटर्न, बार-बार ग्राहक द्वारा रिटर्न और लॉजिस्टिक्स कटौतियों की वजह से लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। इससे मार्केटप्लेस, विक्रेता और लॉजिस्टिक्स पार्टनर के बीच तनाव बढ़ने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी लॉजिस्टिक्स कंपनी का बड़ा वॉल्यूम एक ही ईकॉमर्स इकोसिस्टम पर निर्भर हो जाए, तो उसे “कस्टमर कंसंट्रेशन रिस्क” का सामना करना पड़ सकता है। यानी यदि भविष्य में वह प्लेटफॉर्म अपनी नीतियां बदलता है, कॉन्ट्रैक्ट दोबारा तय करता है या किसी नियामकीय दबाव में आता है, तो इसका सीधा असर लॉजिस्टिक्स कंपनी के कारोबार पर पड़ सकता है।
रिवर्स लॉजिस्टिक्स को सामान्य डिलीवरी की तुलना में ज्यादा महंगा और जटिल माना जाता है। इसमें कई बार पिकअप प्रयास, फ्रॉड वेरिफिकेशन, ग्राहक विवाद और खराब सामान की हैंडलिंग जैसी समस्याएं शामिल रहती हैं। इसलिए केवल ज्यादा शिपमेंट वॉल्यूम हमेशा बेहतर गुणवत्ता वाले मुनाफे में बदल जाए, ऐसा जरूरी नहीं माना जाता।
इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि भविष्य में ऑनलाइन रिटर्न पॉलिसी, सेलर प्रोटेक्शन और लॉजिस्टिक्स ट्रांसपेरेंसी को लेकर सरकारी स्तर पर सख्ती बढ़ती है, तो इसका असर उन कंपनियों पर ज्यादा दिखाई दे सकता है जो बड़े पैमाने पर रिवर्स लॉजिस्टिक्स पर निर्भर हैं।
हालांकि दूसरी तरफ यह भी सच है कि Shadowfax ने बेहद कम समय में देश के सबसे बड़े लॉजिस्टिक्स नेटवर्क्स में अपनी जगह बनाई है। क्विक कॉमर्स और ईकॉमर्स के विस्तार के बीच कंपनी की ग्रोथ को बाजार में बड़ी सफलता माना जा रहा है।
लेकिन अब निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है — क्या Shadowfax लंबे समय तक टिकाऊ लॉजिस्टिक्स मॉडल बना रही है, या फिर उसकी मौजूदा तेज़ ग्रोथ एक ऐसे रिटर्न-आधारित ईकॉमर्स सिस्टम पर अधिक निर्भर होती जा रही है, जिसकी आर्थिक व्यवहार्यता पर आने वाले वर्षों में बड़े सवाल खड़े हो सकते हैं?



