बिलासपुर के पद्मश्री अनूप रंजन पांडेय को लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके दीर्घकालीन योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नई दिल्ली में आयोजित अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 2024 और 2025 के पुरस्कारों के लिए पांडेय का चयन छत्तीसगढ़ की लोक नृत्य परंपरा के क्षेत्र में किया था।
सम्मान मिलने के बाद अनूप रंजन पांडेय ने इसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया। चार दशक से अधिक समय से लोक संगीत, अभिनय, निर्देशन और लोक संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय पांडेय ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला विधाओं के संरक्षण और उन्हें देश-विदेश के मंच तक पहुंचाने में काम किया है।
राष्ट्रपति ने लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण पर दिया जोर
समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि सम्मानित कलाकार मिलकर भारत का ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, जिसमें देश की अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी से जुड़ी कथाएं, गीत, नृत्य और उत्सव शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय कला परंपराओं में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बदलते समय में कई लोक कलाओं के सामने विलुप्त होने का खतरा है। इसलिए इन कलाओं का दस्तावेजीकरण करने के साथ उन्हें जीवंत बनाए रखने के लिए भी प्रयास जरूरी हैं।
राष्ट्रपति ने लोक और जनजातीय कलाओं को भारत की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि इन कला रूपों में समुदाय की स्मृति और सामूहिक चेतना के साथ प्रकृति के साथ गहरा संबंध भी दिखाई देता है।
पद्मश्री समेत कई सम्मान मिल चुके
अनूप रंजन पांडेय को लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान के लिए पहले भी कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2019 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया था।
उन्हें संस्कृति मंत्रालय की गुरु-शिष्य परंपरा योजना के तहत 2006 से 2008 तक लोकनाट्य ‘तारे-नारे’ के गुरु के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। इसके अलावा वरिष्ठ अध्येतावृत्ति सम्मान-2016, टैगोर नेशनल स्कॉलरशिप 2019-20, छत्तीसगढ़ शासन का दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान-2014 और राष्ट्रीय स्वयं सिद्धश्री सम्मान-2017 भी उन्हें मिल चुका है।
नौ साल की उम्र में शुरू किया था मंच
21 जुलाई 1965 को बिलासपुर में जन्मे और जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम कोसा से जुड़े अनूप रंजन पांडेय को संगीत, साहित्य और संस्कृति की शुरुआती शिक्षा परिवार से मिली। उनकी माता भजन गायिका स्वर्गीय मनोरमा पांडेय और पिता शिक्षाविद एवं संस्कृत के विद्वान स्वर्गीय राधेश्याम पांडेय उनके गुरु भी रहे।
गांव में होने वाले नाचा और रहस लोकनाट्य से प्रभावित पांडेय ने नौ वर्ष की उम्र में रेलवे स्कूल, बिलासपुर के मंच से पहली औपचारिक प्रस्तुति दी। इसके बाद अभिनय और लोक रंगमंच उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र बन गया।
हबीब तनवीर के साथ भी किया काम
अनूप रंजन पांडेय के सांस्कृतिक जीवन में 1988-89 का दौर महत्वपूर्ण रहा, जब उन्हें पद्मभूषण हबीब तनवीर के निर्देशन में नया थिएटर के साथ काम करने का अवसर मिला।
हबीब तनवीर के निर्देशन में उन्होंने ‘चरणदास चोर’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘आगरा बाजार’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘मोर नाव दमाद गांव के नाव ससुरार’, ‘सड़क’, ‘कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना’, ‘राजरक्त’, ‘वेणीसंहार’ और ‘जिस लाहौर देख्या नई जन्मयाई नई’ जैसे नाटकों में अभिनय किया।
इन प्रस्तुतियों के साथ उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों में भी यात्राएं कीं। वर्ष 1993 में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड तथा 2006 में जर्मनी में प्रस्तुतियां दीं।
3000 से ज्यादा नुक्कड़ नाटकों के जरिए जनजागरण
1990 के दशक में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के साथ उनका सांस्कृतिक कार्य व्यापक जनजागरूकता अभियान से जुड़ा। उन्होंने गांव-गांव जाकर साक्षरता, महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य जैसे विषयों पर नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से लोगों तक संदेश पहुंचाया।
इस दौर में उनके नेतृत्व और सहभागिता में 3,000 से अधिक नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन किया गया।
2500 लोकगीत और 175 लोकवाद्यों का संकलन
लोक रंगमंच के साथ अनूप रंजन पांडेय ने छत्तीसगढ़ की मौखिक और वाचिक परंपराओं को संकलित करने का काम भी किया। उन्होंने प्रदेश के करीब 2,500 लोकगीत, लोकगाथा और लोकवार्ताओं के साथ 150 लोकनाट्य नाचा के नकल-प्रहसनों और 175 लोकवाद्यों का संग्रह किया।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उन्होंने 80 लोकवाद्य महंत घासीदास संग्रहालय को सौंपे। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल के लिए उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों से 200 सुषिर लोकवाद्यों का संग्रह भी किया।
बस्तर बैंड के जरिए दिया ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ का संदेश
बस्तर की लोक परंपराओं से जुड़े कार्यों के दौरान अनूप रंजन पांडेय ने पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोक संगीत की शक्ति को नए तरीके से सामने रखने की पहल की। करीब डेढ़ दशक पहले उन्होंने आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर ‘बस्तर बैंड’ की स्थापना की।
बस्तर क्षेत्र के 70 से अधिक पारंपरिक और दुर्लभ लोकवाद्यों को एक साथ प्रस्तुत करने वाले इस समूह के माध्यम से उन्होंने युवाओं को लोक संगीत और सृजनात्मक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया।
बस्तर में हिंसा और बंदूक संस्कृति के बीच बस्तर बैंड ने ‘बंदूक छोड़ो… ढोल पकड़ो’ अभियान चलाया। इसके माध्यम से लोकवाद्य, लोकगीत, लोकगाथा और आदिवासी कला परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ शांति का संदेश देने का काम किया गया।
इस पहल के तहत 100 से अधिक बिखरी हुई कला मंडलियों को फिर से संगठित किया गया और 5,000 से अधिक कलाकारों को सक्रिय किया गया। बस्तर बैंड के 11 कलाकारों को अब तक राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं।
रूस, इटली और दक्षिण अफ्रीका तक पहुंची बस्तर की धुन
बस्तर बैंड और उससे जुड़े कलाकारों ने देश के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों के अलावा विदेशों में भी प्रस्तुतियां दी हैं। रूस, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली में बस्तर की लोक संस्कृति और पारंपरिक वाद्यों की प्रस्तुतियां दी गईं।
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपालों, केंद्रीय मंत्रियों, कूटनीतिज्ञों और विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों के कार्यक्रमों में भी बस्तर बैंड अपनी प्रस्तुतियां दे चुका है।
साहित्य और शोध में भी योगदान
अनूप रंजन पांडेय ने लोक संस्कृति के साथ साहित्य और शोध के क्षेत्र में भी काम किया है। उन्होंने सतत शिक्षा कार्यक्रम के लिए राज्य संसाधन केंद्र द्वारा तैयार 114 नवपाठक साहित्य के संपादन में योगदान दिया।
गोंड-परधान चित्रकारी पर आधारित ‘करम देव’ और ‘भगवान का धरती से ग़ायब हो जाना’ जैसे प्रकाशनों का संपादन भी उनके कार्यों में शामिल है।
वर्ष 2015 में उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
संगीत नाटक अकादमी की सामान्य परिषद में तीन कार्यकाल
अनूप रंजन पांडेय संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली की सामान्य परिषद में करीब 15 वर्षों तक तीन कार्यकाल के लिए सदस्य रहे। उन्होंने वर्ष 2004, 2009 और 2014 में परिषद में जिम्मेदारी निभाई।
इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय की अध्येतावृत्ति योजना की विशेषज्ञ समिति, क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र नागपुर की कार्यक्रम समिति, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की विशेषज्ञ उपसमिति और कई राष्ट्रीय रंगमंच एवं कला संस्थानों की चयन समितियों में भी उन्होंने काम किया है।
संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 2024 और 2025 के पुरस्कारों के लिए कुल 108 कलाकारों का चयन किया है। इनमें संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक एवं जनजातीय कला, कठपुतली तथा अन्य प्रदर्शन कलाओं से जुड़े कलाकार शामिल हैं। अकादमी पुरस्कार के साथ एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि, ताम्रपत्र और अंगवस्त्रम प्रदान किया जाता है।
अनूप रंजन पांडेय को मिला यह सम्मान छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी कला परंपराओं के राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर योगदान की एक और महत्वपूर्ण पहचान के रूप में देखा जा रहा है।



