मुंबई/पनवेल। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के पनवेल स्थित एक आवासीय परियोजना में फ्लैट का कब्जा मिलने का इंतजार कर रहे एक खरीदार को करीब दस साल बाद भी राहत नहीं मिली। वर्ष 2015 में लगभग ₹50.52 लाख में फ्लैट बुक कराने वाले मुलुंड निवासी तपन विसारिया को तय समय पर कब्जा नहीं दिया गया। मामला जिला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचने के बाद आयोग ने डेवलपर Soundlines Eco Homes और उसके साझेदारों को संयुक्त एवं व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए खरीदार की जमा राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।
आयोग ने फ्लैट के लिए जमा की गई ₹45,45,268 की राशि पर 31 दिसंबर 2016 से भुगतान की वास्तविक तारीख तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया है। ब्याज सहित यह राशि लगभग ₹86.37 लाख बताई गई है। इसके अलावा डेवलपर को मानसिक परेशानी और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए कुल ₹75,000 अतिरिक्त देने होंगे।
यह मामला पनवेल तालुका के आष्टे गांव में स्थित ‘साउंड डिलाइट’ (Sound Delight) आवासीय परियोजना का है। आयोग ने माना कि समझौते में तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं देना सेवा में कमी है। आयोग के अनुसार, किसी खरीदार को अपने घर के लिए अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अगस्त 2015 में बुक किया था 876 वर्ग फुट का फ्लैट
मामले के अनुसार, मुलुंड निवासी तपन विसारिया ने अगस्त 2015 में पनवेल के आष्टे गांव स्थित साउंड डिलाइट परियोजना में फ्लैट बुक किया था। यह फ्लैट परियोजना की डी-विंग की तीसरी मंजिल पर था और इसका कारपेट एरिया 876 वर्ग फुट बताया गया है।
फ्लैट की कुल कीमत ₹50.52 लाख तय की गई थी। इसके लिए 7 अगस्त 2015 को बिक्री समझौता पंजीकृत कराया गया। समझौते में डेवलपर को 31 दिसंबर 2016 तक फ्लैट का कब्जा सौंपना था।
खरीदार के अनुसार, उसने फ्लैट की कीमत के मद में ₹45,45,268 का भुगतान किया था। इसके अतिरिक्त उसे कर, स्टांप ड्यूटी और पंजीकरण शुल्क भी देना पड़ा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इन मदों में लगभग ₹1.38 लाख टैक्स, ₹2.53 लाख स्टांप ड्यूटी और ₹30,000 पंजीकरण शुल्क शामिल थे।
लेकिन समझौते में निर्धारित तारीख बीत जाने के बाद भी खरीदार को फ्लैट का कब्जा नहीं मिला। परियोजना की पूर्णता और कब्जा देने की समय-सीमा को कई बार आगे बढ़ाया गया।
31 दिसंबर 2016 की समय-सीमा के बाद भी नहीं मिला कब्जा
विसारिया का कहना था कि उन्होंने निर्धारित समय में फ्लैट मिलने की उम्मीद के साथ भुगतान किया था, लेकिन डेवलपर तय समय पर निर्माण पूरा कर कब्जा नहीं दे सका।
परियोजना की समय-सीमा आगे बढ़ने का सिलसिला जारी रहा। महाराष्ट्र रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण (महारेरा) के ऑनलाइन रिकॉर्ड में बाद में परियोजना की संशोधित पूर्णता समय-सीमा 30 सितंबर 2026 दिखाई गई थी।
इसका मतलब यह हुआ कि मूल समझौते में तय दिसंबर 2016 की तारीख के मुकाबले परियोजना की समय-सीमा लगभग नौ साल नौ महीने आगे चली गई। 2 नवंबर 2026 की स्थिति में यह संशोधित तारीख भी बीत चुकी है।
हालांकि, परियोजना की संशोधित समय-सीमा और उपभोक्ता आयोग के आदेश को अलग-अलग समझना जरूरी है। आयोग के सामने मुख्य विवाद खरीदार के साथ हुए बिक्री समझौते, भुगतान और तय तारीख पर कब्जा नहीं दिए जाने से संबंधित था।
खरीदार ने निर्माण की प्रगति और सुविधाओं पर भी उठाए सवाल
खरीदार ने केवल कब्जा मिलने में देरी की शिकायत नहीं की थी। शिकायत में निर्माण की प्रगति, भुगतान की मांग और परियोजना के प्रचार में बताई गई सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।
विसारिया की ओर से आरोप लगाया गया कि डेवलपर ने निर्माण की वास्तविक प्रगति बताने वाला आर्किटेक्ट प्रमाणपत्र उपलब्ध कराए बिना ही उनसे भुगतान की मांग की। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें निर्माण स्थल का निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी गई।
इसके अलावा, परियोजना के ब्रोशर में जिन सुविधाओं का उल्लेख किया गया था, उनमें से कुछ को बाद में रद्द किए जाने या उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाया गया। इनमें क्लब हाउस, एम्फीथिएटर और बच्चों के खेलने की जगह जैसी सुविधाएं शामिल थीं।
इन बिंदुओं को खरीदार की शिकायत में उठाए गए आरोपों के रूप में देखा जाना चाहिए। आयोग के आदेश का मुख्य आधार तय समय पर कब्जा नहीं देना और उससे जुड़ी सेवा में कमी था। प्रत्येक आरोप पर अलग से अंतिम निष्कर्ष मान लेना उचित नहीं होगा।
डेवलपर और साझेदार आयोग के सामने पेश नहीं हुए
खरीदार ने अपनी शिकायत के समर्थन में बिक्री समझौते, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान संबंधी मांग पत्र, ईमेल पत्राचार, तस्वीरें और होम लोन पर चुकाए गए ब्याज का विवरण जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए।
मामले की सुनवाई के दौरान Soundlines Eco Homes और उसके साझेदारों को नोटिस भेजे जाने के बावजूद वे उपभोक्ता आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद आयोग ने उनकी अनुपस्थिति में मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई।
इसे कानूनी भाषा में एकतरफा कार्यवाही यानी एक्स-पार्टी कार्यवाही कहा जाता है। ऐसी स्थिति में आयोग शिकायतकर्ता की ओर से पेश किए गए दस्तावेज और उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय ले सकता है।
आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि खरीदार को समझौते में निर्धारित अवधि के भीतर कब्जा नहीं दिया गया और देरी के संबंध में डेवलपर की ओर से संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया।
आयोग ने 9 प्रतिशत ब्याज के साथ रकम लौटाने का आदेश दिया
अतिरिक्त जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, मुंबई उपनगरीय ने खरीदार की शिकायत स्वीकार करते हुए डेवलपर और उसके साझेदारों को ₹45,45,268 लौटाने का निर्देश दिया।
इस राशि पर 31 दिसंबर 2016 से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की गणना की जाएगी। ब्याज की गणना वास्तविक भुगतान तक जारी रहेगी।
इस आदेश का महत्व केवल मूल राशि की वापसी तक सीमित नहीं है। आयोग ने ब्याज की गणना उस तारीख से शुरू करने का निर्देश दिया जिस दिन समझौते के अनुसार खरीदार को फ्लैट का कब्जा मिल जाना चाहिए था।
इस तरह खरीदार को केवल जमा रकम वापस करने के बजाय, डेवलपर की ओर से तय समय में सेवा उपलब्ध नहीं कराने के कारण वर्षों तक रोकी गई राशि पर भी ब्याज देना होगा।
रिपोर्ट किए गए हिसाब के अनुसार, मूल राशि और उस पर संचित ब्याज मिलाकर कुल वापसी लगभग ₹86.37 लाख होती है। वास्तविक भुगतान की तारीख के अनुसार ब्याज की अंतिम रकम में बदलाव हो सकता है।
इसके अतिरिक्त आयोग ने मानसिक परेशानी और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए कुल ₹75,000 देने का भी निर्देश दिया। इस राशि में मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए ₹50,000 तथा मुकदमेबाजी के खर्च के लिए ₹25,000 शामिल हैं। आदेश में इन भुगतानों के लिए 45 दिन की अवधि का उल्लेख किया गया है।
होम लोन के ₹5.23 लाख ब्याज की मांग खारिज
इस मामले में आयोग ने खरीदार की सभी आर्थिक मांगों को स्वीकार नहीं किया। विसारिया ने फ्लैट खरीदने के लिए भारतीय स्टेट बैंक से लिए गए होम लोन पर चुकाए गए लगभग ₹5.23 लाख ब्याज की राशि भी डेवलपर से वापस दिलाने की मांग की थी।
आयोग ने इस मांग को खारिज कर दिया।
इस संबंध में आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2025 के फैसले ‘ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम अनुपम गर्ग’ का हवाला दिया। आयोग का मानना था कि खरीदार ने स्वतंत्र रूप से बैंक से ऋण लिया था और उस ऋण की मूल रकम तथा ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी उसके और बैंक के बीच हुए ऋण समझौते के तहत थी।
सिर्फ इसलिए कि खरीदार ने फ्लैट के लिए धन जुटाने के लिए बैंक से कर्ज लिया और उस पर ब्याज चुकाया, यह जरूरी नहीं हो जाता कि डेवलपर उस पूरे बैंक ब्याज की प्रतिपूर्ति करे।
इस प्रकार आयोग ने डेवलपर से फ्लैट की जमा राशि पर ब्याज और मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन बैंक ऋण पर चुकाए गए ब्याज की अलग मांग स्वीकार नहीं की।
घर खरीदारों के लिए क्या मायने रखता है यह आदेश?
यह मामला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो निर्माणाधीन परियोजनाओं में फ्लैट खरीदते हैं और समझौते में तय समय पर कब्जा नहीं मिलने के कारण वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं।
अक्सर खरीदार फ्लैट की कीमत का बड़ा हिस्सा भुगतान कर देते हैं। इसके बाद उन्हें एक साथ किराया और होम लोन की ईएमआई चुकानी पड़ सकती है। परियोजना में देरी होने पर खरीदार को आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक परेशानी भी होती है।
इस मामले में आयोग ने यह स्पष्ट किया कि डेवलपर को बिक्री समझौते में दी गई समय-सीमा का पालन करना चाहिए। यदि तय अवधि में कब्जा नहीं दिया जाता और देरी का संतोषजनक आधार प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो उपभोक्ता आयोग से राहत मांगी जा सकती है।
हालांकि, प्रत्येक मामले का निर्णय उसके समझौते, भुगतान के रिकॉर्ड, परियोजना की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होता है। इस आदेश को हर विलंबित परियोजना में स्वतः लागू होने वाला एक समान परिणाम नहीं माना जा सकता।
फ्लैट खरीदने वाले लोगों के लिए परियोजना का महारेरा पंजीकरण, स्वीकृत निर्माण योजना, पूर्णता की समय-सीमा, कब्जा देने की शर्तें और डेवलपर की ओर से किए गए वादों की जांच करना आवश्यक है। भुगतान के सभी प्रमाण, पत्राचार और निर्माण संबंधी दस्तावेज सुरक्षित रखना भी महत्वपूर्ण है।
पनवेल की परियोजना और डेवलपर पर अब निगाहें
साउंड डिलाइट परियोजना से जुड़ा यह मामला इस बात को सामने लाता है कि निर्माणाधीन आवासीय परियोजना में घोषित समय-सीमा का पालन नहीं होने पर खरीदार को कितनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।
विसारिया ने 2015 में घर खरीदने के लिए समझौता किया था और उन्हें दिसंबर 2016 तक कब्जा मिलना था। लगभग एक दशक बाद उपभोक्ता आयोग ने उनकी जमा राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया।
इस आदेश के अनुसार, Soundlines Eco Homes और उसके साझेदारों को खरीदार की ₹45.45 लाख से अधिक की मूल जमा राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा ₹75,000 अतिरिक्त राशि देनी होगी। ब्याज सहित कुल भुगतान लगभग ₹86.37 लाख बताया गया है।
यह आदेश डेवलपर के लिए एक महत्वपूर्ण उपभोक्ता आयोग का प्रतिकूल निर्णय है। हालांकि, यह दोषपूर्ण सेवा और कब्जे में देरी से संबंधित उपभोक्ता विवाद का फैसला है, इसे आपराधिक धोखाधड़ी का निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।



