AI+ स्मार्टफोन विवाद भारत के टेक उद्योग की सबसे चर्चित बहसों में शामिल हो गया है। लोकप्रिय टेक यूट्यूबर अरुण मैनी, जिन्हें दुनिया भर में Mrwhosetheboss के नाम से जाना जाता है, ने एक विस्तृत जांच वीडियो जारी कर AI+ Smartphones और उसके संस्थापक माधव शेठ से जुड़े कई विवादित दावों को सामने रखा है। यह मामला अब केवल एक स्मार्टफोन ब्रांड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि डेटा प्राइवेसी, उपभोक्ता अधिकार, “Made in India” ब्रांडिंग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ गया है।
जुलाई 2025 में AI+ ने खुद को भारत का पहला “सॉवरेन स्मार्टफोन ब्रांड” बताते हुए बाजार में प्रवेश किया था। कंपनी ने दावा किया था कि उसके डिवाइस भारत में कल्पना किए गए, विकसित किए गए और भारतीय उपभोक्ताओं के डेटा को देश के भीतर सुरक्षित रखने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं। यही दावा कंपनी की पहचान का सबसे बड़ा आधार बना।
विवाद तब शुरू हुआ जब कई भारतीय टेक यूट्यूबर्स ने AI+ स्मार्टफोन्स की समीक्षा करनी शुरू की। रिपोर्ट के अनुसार ग्यान थेरेपी ने सबसे पहले डिवाइस के सॉफ्टवेयर का विश्लेषण करते हुए कुछ प्री-इंस्टॉल्ड एप्लिकेशन्स पर सवाल उठाए। इनमें Clean Assistant, Phone Clone और Mobile Butler जैसे ऐप शामिल बताए गए, जिनके बारे में आरोप लगाया गया कि उनकी प्राइवेसी पॉलिसी और तकनीकी संरचना कथित रूप से चीनी कंपनियों से जुड़ी दिखाई देती है।
जांच में यह भी दावा किया गया कि AI+ के कुछ स्मार्टफोन चीनी ODM (Original Design Manufacturer) कंपनियों के पहले से मौजूद मॉडलों से काफी मिलते-जुलते हैं। वीडियो में विशेष रूप से Sprocom नामक चीनी निर्माता से कथित समानताओं का उल्लेख किया गया है। हालांकि ODM मॉडल का उपयोग वैश्विक स्मार्टफोन उद्योग में आम बात है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे कंपनी के “भारतीय डिज़ाइन” संबंधी दावों पर सवाल खड़े होते हैं।
विवाद का एक बड़ा हिस्सा AI+ Nova Flip स्मार्टफोन को लेकर भी है। कुछ समीक्षकों ने आरोप लगाया कि यह डिवाइस चीनी कंपनी ZTE के Nubia Flip 2 से काफी मिलता-जुलता है। जांच में कथित तौर पर ZTE से जुड़े सॉफ्टवेयर, सर्विस और सिस्टम पहचानकर्ताओं के स्क्रीनशॉट भी दिखाए गए। हालांकि माधव शेठ ने इंटरव्यू में कहा कि ZTE की भागीदारी को उत्पाद पैकेजिंग पर दर्शाया गया था।
इसके अलावा AI+ के Wearbuds उत्पादों को लेकर भी सवाल उठे। वीडियो में दावा किया गया कि ये उत्पाद चीनी कंपनी AI Power के उत्पादों से काफी समानता रखते हैं। लोगो, डिज़ाइन और सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर दोनों कंपनियों के बीच संबंधों को लेकर चर्चाएं तेज हुईं।
मामला तब और गंभीर हो गया जब AI+ ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। कंपनी को TechWiser और TechBar जैसे यूट्यूब चैनलों के खिलाफ एक एक्स-पार्टी अंतरिम आदेश मिला, जिसके तहत कथित रूप से कुछ आलोचनात्मक कंटेंट को हटाया गया। इस आदेश में “John Doe” प्रावधान भी शामिल था, जिसे लेकर कई कानूनी विशेषज्ञों ने चिंता जताई। उनका कहना था कि ऐसे प्रावधान आमतौर पर पाइरेसी मामलों में उपयोग किए जाते हैं और तकनीकी समीक्षा विवादों में इसका इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल पैदा करता है।
वीडियो में यह भी दावा किया गया कि कुछ कंटेंट क्रिएटर्स को शुरुआती सुनवाई के दौरान प्रभावी रूप से अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला। हालांकि इन दावों पर अंतिम निर्णय अदालत की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माधव शेठ के साथ किया गया विस्तृत इंटरव्यू भी रहा। बातचीत के दौरान उन्होंने कंपनी की मंशा का बचाव किया और कहा कि उपभोक्ताओं को गुमराह करने का कोई इरादा नहीं था। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कंटेंट क्रिएटर्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना शायद जल्दबाजी में लिया गया फैसला हो सकता है।
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आज के वैश्विक तकनीकी युग में “Made in India” की वास्तविक परिभाषा क्या है। क्या किसी उत्पाद का भारत में असेंबल होना पर्याप्त है, या उसका डिजाइन, सॉफ्टवेयर और बौद्धिक संपदा भी पूरी तरह भारतीय होनी चाहिए? विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक सप्लाई चेन के दौर में अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद कई देशों के सहयोग से बनते हैं, इसलिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता है।
फिलहाल AI+ स्मार्टफोन विवाद अदालत, टेक समुदाय और उपभोक्ताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। कई आरोपों की न्यायिक जांच और कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है। लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने भारत में टेक ब्रांडिंग, उपभोक्ता विश्वास और डिजिटल स्वतंत्रता पर एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है।



