आईपीओ बाजार में इस समय शिपरॉकेट और बिहारी लाल इंजीनियरिंग दो ऐसी कंपनियां हैं, जिनकी तुलना निवेशकों के बीच स्वाभाविक रूप से हो रही है। दोनों आईपीओ 12 से 14 अगस्त तक खुले हैं और दोनों के शेयरों की 19 अगस्त को सूचीबद्धता प्रस्तावित है। हालांकि अंतिम तस्वीर सूचीबद्धता और उसके बाद के बाजार प्रदर्शन से ही साफ होगी, लेकिन उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों और शुरुआती सदस्यता आंकड़ों को देखें तो बिहारी लाल इंजीनियरिंग फिलहाल शिपरॉकेट से मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है।
खास तौर पर मुनाफे, लाभप्रदता अनुपात और शुरुआती निवेशक मांग के मामले में बिहारी लाल इंजीनियरिंग के आंकड़े बेहतर नजर आते हैं। दूसरी ओर, शिपरॉकेट का कारोबार काफी बड़ा है और उसकी वृद्धि की संभावना भी अधिक है। इसलिए दोनों कंपनियों की तुलना केवल कारोबार के आकार से नहीं, बल्कि मूल्यांकन, मुनाफे, वृद्धि और निवेशक मांग के आधार पर करना अधिक उचित होगा।
आईपीओ का आकार और मूल्य दायरा अलग
बिहारी लाल इंजीनियरिंग का आईपीओ 271 से 285 रुपये प्रति शेयर के मूल्य दायरे में आया है। इसका कुल आकार करीब 301.62 करोड़ रुपये है।
इसके मुकाबले शिपरॉकेट ने 92 से 97 रुपये प्रति शेयर के मूल्य दायरे में करीब 1,617.48 करोड़ रुपये का आईपीओ पेश किया है।
दोनों कंपनियों का कारोबार अलग-अलग क्षेत्रों में है। इसलिए केवल यह देखना कि किस कंपनी का आईपीओ बड़ा है, निवेश के लिहाज से सही तुलना नहीं होगी। असली अंतर कंपनी की कमाई, लाभप्रदता, कारोबार की वृद्धि, मूल्यांकन और बाजार की मांग में दिखाई देता है।
मुनाफे में बिहारी लाल इंजीनियरिंग आगे
दोनों कंपनियों के बीच सबसे बड़ा अंतर मुनाफे का है।
बिहारी लाल इंजीनियरिंग ने वित्त वर्ष 2026 में परिचालन से 534.03 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया और करीब 101.33 करोड़ रुपये का EBITDA हासिल किया। कंपनी का शुद्ध मुनाफा 64.64 करोड़ रुपये रहा। वित्त वर्ष 2025 में कंपनी का शुद्ध मुनाफा 52.95 करोड़ रुपये था।
सेबी के समक्ष दाखिल कंपनी के दस्तावेजों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में उसका EBITDA मार्जिन 18.97 प्रतिशत, शुद्ध लाभ मार्जिन 12.10 प्रतिशत, पूंजी पर प्रतिफल (ROCE) 27.11 प्रतिशत और इक्विटी पर प्रतिफल (ROE) 23.60 प्रतिशत रहा।
इसका मतलब है कि कंपनी केवल कारोबार नहीं बढ़ा रही, बल्कि अपने कारोबार से वास्तविक मुनाफा भी कमा रही है।
शिपरॉकेट का कारोबार बड़ा, लेकिन शुद्ध मुनाफा अभी बाकी
शिपरॉकेट का कारोबार बिहारी लाल इंजीनियरिंग की तुलना में काफी बड़ा है। वित्त वर्ष 2026 में कंपनी का राजस्व करीब 2,077.42 करोड़ रुपये रहा।
लेकिन कंपनी अभी शुद्ध मुनाफे में नहीं पहुंची है। इसी अवधि में शिपरॉकेट को करीब 79.25 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ।
कंपनी का समायोजित EBITDA सकारात्मक बताया गया है और इसका मार्जिन करीब 12.56 प्रतिशत रहा। लेकिन रिपोर्ट किए गए शुद्ध लाभ के स्तर पर कंपनी अभी भी घाटे में है।
यहीं दोनों आईपीओ की निवेश कहानी अलग हो जाती है। बिहारी लाल इंजीनियरिंग में निवेशक ऐसी कंपनी को देख रहे हैं जो पहले से मुनाफे में है। शिपरॉकेट के मामले में निवेशकों को यह उम्मीद लगानी होगी कि तेज राजस्व वृद्धि और कारोबार के विस्तार के साथ भविष्य में कंपनी लगातार शुद्ध मुनाफा कमाने लगेगी।
शुरुआती सदस्यता में भी बिहारी लाल इंजीनियरिंग आगे
आईपीओ खुलने के पहले दिन बिहारी लाल इंजीनियरिंग को कुल 2.03 गुना सदस्यता मिली थी। खुदरा निवेशकों का हिस्सा 2.70 गुना, गैर-संस्थागत निवेशकों का हिस्सा 2.11 गुना और पात्र संस्थागत खरीदारों का हिस्सा 0.73 गुना भरा था।
शिपरॉकेट के पहले दिन का कुल सदस्यता आंकड़ा करीब 0.97 गुना रहा। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार दूसरे दिन भी निवेशकों की मांग बढ़ी। 13 अगस्त की सुबह के एक समय के आंकड़े में कुल सदस्यता करीब 1.28 गुना पहुंच गई थी। उस समय खुदरा हिस्सा 4.35 गुना और गैर-संस्थागत हिस्सा 1.72 गुना था, जबकि पात्र संस्थागत खरीदारों का हिस्सा केवल 0.02 गुना था।
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि आईपीओ सदस्यता के आंकड़े पूरे दिन बदलते रहते हैं। इसलिए किसी भी आंकड़े को समय के संदर्भ के साथ देखना चाहिए।
जीएमपी में सावधानी जरूरी
ग्रे मार्केट प्रीमियम यानी GMP की तुलना करते समय निवेशकों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। शिपरॉकेट का कोई आधिकारिक GMP नहीं है। ग्रे मार्केट में अलग-अलग समय और अलग-अलग कारोबारियों से अलग-अलग भाव सामने आ सकते हैं।
13 अगस्त को उपलब्ध विभिन्न बाजार ट्रैकर्स में शिपरॉकेट के GMP के अलग-अलग आंकड़े दिखाई दे रहे थे। कुछ रिपोर्टों में 14 रुपये का प्रीमियम बताया गया, जबकि अन्य स्रोतों में इससे काफी ऊंचे आंकड़े सामने आए। इसलिए किसी एक वेबसाइट पर दिख रहे GMP को कंपनी का आधिकारिक आंकड़ा मानना सही नहीं होगा।
बिहारी लाल इंजीनियरिंग के मामले में भी यही स्थिति है। विभिन्न ट्रैकर्स ने करीब 65 से 74 रुपये तक के GMP की जानकारी दी। एक बाजार रिपोर्ट में करीब 26 प्रतिशत के प्रीमियम का उल्लेख भी किया गया है।
इसलिए GMP को केवल अनौपचारिक बाजार धारणा के संकेतक के रूप में देखना चाहिए। इसे वास्तविक सूचीबद्धता मूल्य या निवेशकों के भरोसे का पक्का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
बिहारी लाल इंजीनियरिंग का GMP फिलहाल आकर्षक, लेकिन इससे फैसला तय नहीं
यदि केवल रिपोर्ट किए गए ग्रे मार्केट भावों की तुलना की जाए तो बिहारी लाल इंजीनियरिंग की तस्वीर फिलहाल मजबूत दिखाई देती है।
285 रुपये के ऊपरी मूल्य दायरे पर 65 रुपये का GMP करीब 23 प्रतिशत और 74 रुपये का GMP करीब 26 प्रतिशत प्रीमियम दर्शाता है।
शिपरॉकेट के 97 रुपये के ऊपरी मूल्य दायरे पर 14 रुपये का GMP करीब 14.4 प्रतिशत प्रीमियम बनता है। हालांकि शिपरॉकेट के लिए दूसरे ट्रैकर्स ने इससे काफी ऊंचे प्रीमियम भी बताए हैं।
इसलिए केवल GMP के आधार पर दोनों में से किसी एक को निश्चित विजेता घोषित करना उचित नहीं होगा।
कारोबार के आकार में शिपरॉकेट काफी आगे
जहां बिहारी लाल इंजीनियरिंग मुनाफे में आगे दिखाई देती है, वहीं कारोबार के आकार और डिजिटल विस्तार के मामले में शिपरॉकेट की स्थिति काफी मजबूत है।
शिपरॉकेट का वित्त वर्ष 2026 का राजस्व करीब 2,077 करोड़ रुपये रहा, जबकि बिहारी लाल इंजीनियरिंग का कारोबार करीब 534 करोड़ रुपये के स्तर पर है।
शिपरॉकेट ऑनलाइन विक्रेताओं और ब्रांडों को लॉजिस्टिक्स तथा ऑर्डर पूर्ति से जुड़ी तकनीकी सेवाएं देती है। कंपनी का कारोबार ई-कॉमर्स के विस्तार के साथ बढ़ने की क्षमता रखता है।
यही वजह है कि शिपरॉकेट का मूल्यांकन केवल वर्तमान मुनाफे से नहीं किया जा सकता। निवेशकों का एक वर्ग कंपनी के भविष्य के कारोबार और संभावित लाभप्रदता को भी महत्व देगा।
शिपरॉकेट को एंकर निवेशकों का समर्थन
शिपरॉकेट ने आईपीओ खुलने से पहले एंकर निवेशकों से 727.41 करोड़ रुपये जुटाए। कंपनी ने 50 एंकर निवेशकों को 97 रुपये प्रति शेयर की दर से 7.5 करोड़ शेयर आवंटित किए। एंकर निवेशकों में गोल्डमैन सैक्स, नोमुरा, सोसाइटी जेनरल, एचडीएफसी म्यूचुअल फंड और एसबीआई म्यूचुअल फंड समेत कई संस्थागत निवेशक शामिल थे।
हालांकि एंकर बुक को भी सावधानी से समझना चाहिए। इसमें म्यूचुअल फंड और अन्य संस्थागत पूंजी शामिल है। इसलिए 727.41 करोड़ रुपये के एंकर आवंटन को सीधे यह कहना कि 50 निवेशकों ने अपने निजी पैसे से शिपरॉकेट पर दांव लगाया है, सही तस्वीर नहीं होगी।
बिहारी लाल इंजीनियरिंग की वित्तीय स्थिति भी पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं
बिहारी लाल इंजीनियरिंग के वित्तीय आंकड़े मजबूत दिखाई देते हैं, लेकिन कंपनी के कारोबार में जोखिम भी हैं।
कंपनी के दस्तावेजों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में उसका शुद्ध मूल्य करीब 306.10 करोड़ रुपये था और शुद्ध कर्ज करीब 16.64 करोड़ रुपये रहा। ऋण और इक्विटी का अनुपात करीब 0.06 था। परिचालन से नकदी प्रवाह करीब 27.54 करोड़ रुपये रहा।
कंपनी ने कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कच्चे माल की उपलब्धता, ग्राहकों पर निर्भरता और कार्यशील पूंजी चक्र को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है।
वित्त वर्ष 2026 में उसके पांच सबसे बड़े ग्राहकों से करीब 25.49 प्रतिशत राजस्व आया। वहीं कच्चे माल की लागत कुल खर्च का करीब 61.02 प्रतिशत रही। इसका मतलब है कि कंपनी का मुनाफा इस्पात की कीमतों और कच्चे माल की लागत में बदलाव से प्रभावित हो सकता है।
तो किसकी तस्वीर ज्यादा मजबूत?
इस तुलना का सबसे सीधा निष्कर्ष यह है कि वर्तमान मुनाफे और लाभप्रदता के आधार पर बिहारी लाल इंजीनियरिंग फिलहाल शिपरॉकेट से आगे दिखाई देती है।
बिहारी लाल इंजीनियरिंग ने वित्त वर्ष 2026 में 64.64 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा और 18.97 प्रतिशत का EBITDA मार्जिन दर्ज किया है। इसके मुकाबले शिपरॉकेट ने इसी अवधि में 79.25 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि सवाल यह है कि आज के वित्तीय आंकड़ों के आधार पर कौन सी कंपनी मजबूत है, तो बिहारी लाल इंजीनियरिंग के आंकड़े बेहतर हैं।
लेकिन यदि सवाल यह है कि अगले पांच से दस वर्षों में कौन सी कंपनी ज्यादा बड़ी बन सकती है, तो शिपरॉकेट की तस्वीर अलग हो सकती है। ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स का बड़ा बाजार, कंपनी का मौजूदा कारोबार और तेजी से बढ़ने की क्षमता उसे अधिक विस्तार का अवसर देती है।
19 अगस्त को होगी पहली बड़ी बाजार परीक्षा
फिलहाल निवेशकों के सामने दो बिल्कुल अलग आईपीओ कहानियां हैं—एक तरफ करीब 1,617 करोड़ रुपये का बड़ा और तेजी से बढ़ता, लेकिन अभी शुद्ध घाटे में चल रहा शिपरॉकेट आईपीओ है। दूसरी तरफ करीब 302 करोड़ रुपये का छोटा, लेकिन मुनाफे में चल रहा बिहारी लाल इंजीनियरिंग आईपीओ है।
दोनों कंपनियों के शेयरों की 19 अगस्त को प्रस्तावित सूचीबद्धता इन दोनों कहानियों की पहली वास्तविक बाजार परीक्षा होगी।
तब यह भी साफ होगा कि ग्रे मार्केट में चल रही अनौपचारिक धारणा वास्तविक मांग और मूल्यांकन को कितनी सही तरह से प्रतिबिंबित करती है। तब तक निवेशकों के लिए बेहतर तरीका यही है कि GMP को केवल अनौपचारिक बाजार संकेतक मानें और कंपनी के आधिकारिक वित्तीय आंकड़ों, जोखिमों तथा वास्तविक आईपीओ सदस्यता को अधिक महत्व दें।
अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों, नियामकीय दस्तावेजों और बाजार में उपलब्ध सदस्यता एवं ग्रे मार्केट संबंधी सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। GMP अनौपचारिक और आधिकारिक रूप से विनियमित आंकड़ा नहीं है तथा अलग-अलग स्रोतों में इसके भाव अलग हो सकते हैं। यह लेख निवेश सलाह या किसी आईपीओ में निवेश करने अथवा उससे बचने की सिफारिश नहीं है। निवेश का निर्णय लेने से पहले कंपनी के आधिकारिक ऑफर दस्तावेजों और जोखिम कारकों का अध्ययन करें।



