राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जनजातीय समाज को भारत की सांस्कृतिक आत्मा और प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक बताया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का काम करता आया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जनजातीय समाज केवल परंपराओं का संरक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप भी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के साथ सामंजस्य और संरक्षण की भावना जनजातीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है, जो आज भी समाज को नई सीख देती है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार जनजातीय संस्कृति, भाषाओं और परंपराओं के संरक्षण के लिए लगातार काम कर रही है। सरकार का प्रयास है कि जनजातीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए और उसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों के जरिए जनजातीय प्रतिभाओं को मंच उपलब्ध करा रही है। इन आयोजनों के माध्यम से जनजातीय कला, खेल, संस्कृति और परंपराओं को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जनजातीय समाज की परंपराएं और जीवनशैली प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश देती हैं। यही वजह है कि आज जनजातीय संस्कृति को संरक्षित करना केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरूरी है।
कार्यक्रम के दौरान देशभर से पहुंचे जनजातीय कलाकारों ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समागम को खास बना दिया। पारंपरिक नृत्य, संगीत और लोक कलाओं की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया और समागम को रंगारंग बना दिया।
राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी जनजातीय संस्कृति से भी जुड़ी हुई है और सरकार इसे और मजबूत बनाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।



